कितने दुखड़ो की तर्जुमानी है
आपने कह दिया "कहानी है"
अव्वलन फ़ैसला किया जाए
राब्ता या अना बचानी है
शाम तक घर भी लौटना है हमें
रात की किश्त भी चुकानी है
फ़ैसला शाह को ही करना है
जीतना है कि मात खानी है
मौत का इक सवाल काफ़ी था
"किसलिए ज़िंदगी बचानी है?"
राब्ता ज्यूँ का त्यों ही रखना है
फिर ये दीवार क्यूँँ गिरानी है?
सिर्फ़ प्यासे ही देख सकते हैं
किस की आँखों में कितना पानी है
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