तमाशा बन गया क्या क्या हमारा
समय आया नहीं अच्छा हमारा
बनाता हूँ सलीक़े से घरौंदे
ठहरता ही नहीं अपना हमारा
नहीं देखा अभी तक उस परी को
जहाँ से तय हुआ रिश्ता हमारा
परिंदों को उडाया क़ैदस सो
शिकारी से हुआ झगड़ा हमारा
मुहब्बत को मेरी समझे नहीं तुम
तजरबा ही रहा कच्चा हमारा
— Rudransh Trigunayat















