मुक़द्दर परेशां निग़ाहें मिलाकरसभी रो रहे हैं मुझे आज़माकरयही आरज़ू बस यही है तमन्नादिलों में रहूँ मैं ग़ज़ल गुनगुनाकर— Saarthi Baidyanath