
रस्म-ए-दुनिया निभा रहा हूँ मैं
ज़ख़्म फूलों से खा रहा हूँ मैं
क़ैद कर ख़ुद को एक कमरे में
हँसना रोना सिखा रहा हूँ मैं
एक मुद्दत हुई नहीं आई
और कब से बुला रहा हूँ मैं
— Sabir Pathan
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