अपनी आँखों से तिरा ख़्वाब मिटाना होगा
क्या ही मालूम था तुझ को भी भुलाना होगा
इश्क़ बर्बाद ये कर दे न कहीं दोनों को
मुझ को हर हाल में उस को ही बचाना होगा
उस के ख़्वाबों को हमेशा रखा अव्वल मैं ने
मुझ को ख़्वाबों का गला अपने दबाना होगा
दरमियाँ तीसरे इक शख़्स को ला कर अपने
तू ग़लत है तुझे एहसास दिलाना होगा
कुछ भी बाक़ी न रहे उस का यहाँ इस घर में
साथ सामान के ये दिल भी जलाना होगा
कोई इक शख़्स नहीं दुनिया में मेरे ख़ातिर
उम्र भर क्या मुझे बस ख़ाक उड़ाना होगा
— Sagar Sahab Badayuni















