समझी ही कब थीं तू ने परेशानियाँ मिरी

मैं ने अकेले झेली हैं नाकामियाँ मिरी

कर लूँगा नाम बा'द में पहले ये देख लूँ
करता है कौन शहर में बद-नामियाँ मिरी

मुझ से न दूर जा कहीं बस बैठ पास में
मुझ को ही खा रही हैं ये तन्हाइयाँ मिरी

दोनों में फ़ासला है बहुत वक़्त है अभी
मुझ पे नहीं गईं अभी परछाइयाँ मिरी

होगा नहीं इलाज किसी भी हकीम से
जाएँगी साथ मेरे परेशानियाँ मिरी

सबने सज़ा सुना दी बड़े शौक़ से मुझे
देखी नहीं किसी ने पशेमानियाँ मिरी

ग़ुस्से में बोला जो भी बुरा लग गया तुझे
इक बार याद करती तो नादानियाँ मिरी

दौलत ने इस तरह से चकाचौंध कर दिया
आएँगी कब नज़र तुझे अच्छाइयाँ मिरी

तहज़ीब सीख जाओगी तुम देख कर सही
लाओगी पर कहाँ से वफ़ादारियाँ मिरी

इतना उतर न तू मिरी गहराई में अभी
हैरान कर न दें तुझे हैरानियाँ मिरी

लगता है कम बचे हैं मिरी ज़िंदगी के दिन
अल्लाह कुछ तो कम हुई दुश्वारियाँ मिरी

— Sagar Sahab Badayuni

More by Sagar Sahab Badayuni

Other ghazal from the same pen

See all from Sagar Sahab Badayuni →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling