hua hai ik gazab ka haadsa mujh | हुआ है इक ग़ज़ब का हादसा मुझ

  - Saheb Shrey

हुआ है इक ग़ज़ब का हादसा मुझ
में
कोई रहता है अब मुझ सेे ख़फ़ा मुझ
में

जो पढ़ता था तुम्हें ख़ामोश नज़रों से
वो ज़िंदा है, अभी तक आशना मुझ
में

उठा रक्खी है जो इक लाश कांधे पर
ये वो इक शख़्स है जो मर गया मुझ
में

जिसे 'माँ' ने बहुत नाज़ों से पाला था
उस इक बच्चे को मैं हूँ ढूँढता मुझ
में

सभी से मिल रहा हूँ मुस्कुराकर मैं
न जाने कौन है फिर ग़मज़दा मुझ
में

हक़ीक़त से मेरी वाकिफ़ हैं, मेरे दोस्त
सो अक्सर देखते हैं फायदा मुझ
में

गया था दरमियान-ए-रहगुज़र से जो
कहा तो अलविदा पर रह गया मुझ
में

  - Saheb Shrey

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