कोई इस सफ़र में हमारा नहीं है

सो अब रहगुज़र ये गवारा नहीं है

मिले तो सफ़र में, बहुत दिलनशीं पर
कोई भी मिला तुम से प्यारा नहीं है

बहुत ख़ूब-सूरत नज़ारे है लेकिन
तेरे हुश्न का इस्तिआरा नहीं है

चलो मान लें के ये झूठी है दुनिया
मगर सच भी सच तो तुम्हारा नहीं है

हसीं हैं अगर लब तो तल्ख़ी भी होगी
समुंदर ही क्या वो जो खारा नहीं है

कभी देखना इश्क़ में डूब कर तुम
ये दरिया है जिस
में किनारा नहीं है

अगर चाहते हो ये नफ़रत मिटाना
सिवा इश्क़ के कोई चारा नहीं है

नज़र जा रही है जहाँ तक जहाँ में
सुकूँ से किसी का गुज़ारा नहीं है

अभी आँखें कुछ नम हैं साहेब लेकिन
अभी हौसला हम ने हारा नहीं है

— Saheb Shrey

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