हुआ है इक ग़ज़ब का हादसा मुझ
में
कोई रहता है अब मुझ सेे ख़फ़ा मुझ
में
जो पढ़ता था तुम्हें ख़ामोश नज़रों से
वो ज़िंदा है, अभी तक आशना मुझ
में
उठा रक्खी है जो इक लाश कांधे पर
ये वो इक शख़्स है जो मर गया मुझ
में
जिसे 'माँ' ने बहुत नाज़ों से पाला था
उस इक बच्चे को मैं हूँ ढूँढता मुझ
में
सभी से मिल रहा हूँ मुस्कुराकर मैं
न जाने कौन है फिर ग़मज़दा मुझ
में
हक़ीक़त से मेरी वाकिफ़ हैं, मेरे दोस्त
सो अक्सर देखते हैं फायदा मुझ
में
गया था दरमियान-ए-रहगुज़र से जो
कहा तो अलविदा पर रह गया मुझ
में
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