मुझ को तब थोड़ा सा गुमाँ होता
रस्म को छोड़ तू यहाँ होता
वक़्त तब मेरे साथ था वर्ना
मैं ज़माने से बेनिशाँ होता
तू कभी छोड़ के नहीं जाता
काश इस जिस्म का रुआँ होता
एक दूजे को देखा करते जब
मैं ज़मीं और तू आसमाँ होता
मैं भी पत्ता हरा भरा था कभी
होता अब भी न गर धुआँ होता
— sahllucknowi















