"कश्मकश"
रब ने भी कहा है कि मैं नाराज़ हूँ तुम से
माँ ने भी कहा था कि मेरा नाम न लेना
उस ने भी कहा था कि मोहब्बत नहीं तुम से
इंसान के दर्जात समझ में नहीं आते
ये लोग भी मिलते हैं तो मुँह फेर के अक्सर
मज़हब के मक़ामात समझ में नहीं आते
बेज़ारी-ए-दुनिया का सबब कुछ भी नहीं है
मैं क्या हूँ मेरा नाम-ओ-नसब कुछ भी नहीं है
मज़हब से उलझता हूँ तो महशर में सज़ावार
दुनिया से उलझता हूँ तो रहने नहीं देती
चाहत के तक़ाज़े हैं कि पूरे नहीं होते
यादों की अज़िय्यत है कि मरने नहीं देती
और ख़ून के रिश्ते हैं कि जीने नहीं देते
— Saleem Nutkani















