haar kar rukna nahin manzil bhale hi door hai | हार कर रुकना नहीं मंज़िल भले ही दूर है 


  - SALIM RAZA REWA

हार कर रुकना नहीं मंज़िल भले ही दूर है 

ठोकरें खाकर भी चलना वक़्त का दस्तूर है



हौसले के सामने तक़दीर भी झुक जाएगी
तू बदल सकता है क़िस्मत किसलिए मजबूर है



आदमी की चाह हो तो खिलते है पत्थर में फूल

कौन सी मंज़िल भला जो आदमी से दूर है

ख़ाक का है पुतला इंसाँ ख़ाक में मिल जाएगा

कैसी दौलत कैसी शोहरत क्यूँ भला मग़रूर है



वक़्त से पहले किसी को कुछ नहीं मिलता कभी

वक़्त के हाथों यहाँ हर एक शय मजबूर है

  - SALIM RAZA REWA

Aadmi Shayari

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