दुनिया के लिए आज भी आबाद हैं हम तुम
दूरी है मगर हम में तो बर्बाद हैं हम तुम
उतरें न किसी शख़्स की आँखों से ज़मीं पर
लोगों की नज़र में गड़ी इक याद हैं हम तुम
नफ़रत की नदी में जहाँ बहती हो मोहब्बत
ऐसे ही किसी शहर की बुनियाद हैं हम तुम
हम दोस्त उसूलों की बनावट से बने हैं
वर्ना तो किसी और की फ़रियाद हैं हम तुम
अर्सा हुआ है ज़ेहन से उतरा न कोई शख़्स
सीकर की उन्हीं यादों से आबाद हैं हम तुम
— salman khan "samar"















