मिरी तू आख़िरी हसरत थी कौन मानेगा
तू ज़िंदगी की ज़रूरत थी कौन मानेगा
ज़रा सी बात पे लड़ बैठे एक दूजे से
कभी हमें भी मोहब्बत थी कौन मानेगा
पड़ा हुआ हूँ जनाज़े में शौक़ से लिपटा
ये ज़िंदगी मिरी हसरत थी कौन मानेगा
कभी मुझे भी निगाहों से दूर करना तुम
वगरना मुझ में भी नफ़रत थी कौन मानेगा
हमीं शुमार नहीं थे गुनाह-ए-इश्क़ में तब
जब आप की भी ज़रूरत थी कौन मानेगा
बिना किवाड़ को खटकाए हर कोई आया
कभी हमें ये इज़ाज़त थी कौन मानेगा
— salman khan "samar"















