पलकें झुका के कोई इशारा तो कीजिए

इक बार मेरे सामने आँखों को खोलिए

समझा बुझा के मुझ को यूँ वापिस न भेजिए
आया हूँ उन के दर पे सो मिलने तो दीजिए

बरसों के बा'द आप से ग़ुस्सा हुए हैं हम
कुछ और दिन हमें अभी नाराज़ छोड़िए

उलझे हुए ही ठीक है गेसू घने घने
सुलझा के इन की रौनकें कमतर न कीजिए

बस बोलिए जो मन में है सुनते रहेंगे हम
ख़ामोश रह के हम से तअल्लुक़ न तोड़िए

आवारगी ने मुझ को नई ज़िंदगी है दी
आवारगी को छोड़ दूँ ऐसे न बोलिए

टूटा हुआ पड़ा हूँ किसी काँच की तरह
मुझ को समेटने के लिए सब्र चाहिए

दाईं तरफ़ खड़ा हूँ मगर दो क़दम हूँ दूर
ज़हमत उठा के थोड़ा निगाहों को मोड़िए

सीधा शरीफ़ आदमी बर्बाद है यहाँ
टेढ़ा 'समर' ज़रा सा मुझे होने दीजिए

— salman khan "samar"

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