हँसने पर ज़ख़्मों से मेरे ख़ून रिसता जाए है
वो नहीं होता उमूमन जो भी सोचा जाए है
इस लिए ख़ामोश थी मैं उन की हर इक चाल पर
फिर पशेमान अपना कब महबूब देखा जाए है
इश्क़ से जो बच गया उस का ही बेड़ा पार था
इश्क़ जिस ने कर लिया बे-मौत मारा जाए है
पहले कट जाते थे सर भी अद्ल की ख़ातिर यहाँ
अब शरफ ग़द्दारों को ही सिर्फ़ बख़्शा जाए है
झूठे की हर बात पर सब लोग करते हैं यक़ीं
हर कसौटी पर मगर सच्चे को परखा जाए है
धूप भी निकली हो और बारिश भी हो जब साथ में
वो दु'आओं का ख़ुसूसी वक़्त समझा जाए है
हुक्म हम सब को अमल करने का था जिस पर 'सना'
उस को तो जुज़्दान में अब बंद रक्खा जाए है
— Sana Hashmi















