नूर की हम पे बरसात कर दीजिए
ज़ीस्त से ख़त्म ज़ुल्मात कर दीजिए
कर के शादाब दिल की ये बंजर ज़मीं
मो'जिज़ा या करामात कर दीजिए
ज़ालिमों के सितम की हुई इन्तिहा
अब तो बेख़ौफ़ हक़ बात कर दीजिए
जब सभी लोग सरदार बनने लगें
तब सदारत भी ख़ैरात कर दीजिए
आप अपनी ख़ुराफ़ात ख़ुद तक रखें
हमपे इतनी इनायात कर दीजिए
असलियत से हर इक की मैं वाक़िफ़ नहीं
मुझ को लोगों से मोहतात कर दीजिए
जब मुहब्बत की मंज़िल ही धुँधला गई
दफ़्न तब अपने जज़्बात कर दीजिए
कोई कमतर नहीं कोई बेहतर नहीं
हर नज़र को मुसावात कर दीजिए
कर रही है सना इल्तिजा उन से बस
नाम कुछ मेरे लम्हात कर दीजिए
— Sana Hashmi















