
क़दम इक इक बढ़ाने में सहरस शाम हो जाए
कि मेरी रुख़सती के दिन सड़क भी जाम हो जाए
ज़ियादा कुछ नहीं चाहूँ यहाँ चाहूँ फ़क़त इतना
यहाँ इक रोज़ कुछ आँसू मिरे भी नाम हो जाए
— Sandeep dabral 'sendy'
Other sher from the same pen
Shers of emotional.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling