कि प्यासे को समंदर दिख रहा है
ये क्यूँ शहरों में लश्कर दिख रहा है
मैं उसको जान अपनी मानता था
पर अब उसका भी तेवर दिख रहा है
ये सब नेता जो जनता से बने हैं
उन्हें जनता में नौकर दिख रहा है
है वो अपने अहम में चूर ऐसा
उसे हर शख़्स कमतर दिख रहा है
थका हारा वो दफ़्तर से है आया
उसे तो बस वो बिस्तर दिख रहा है
कि गौरी ने जो दर्पन में है देखा
उसे तो ख़ुद में शंकर दिख रहा है
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Sanskar 'Sanam'
our suggestion based on Sanskar 'Sanam'
As you were reading Mehboob Shayari Shayari