लिखते-लिखते लिखना अच्छा आता है
पढ़ते-पढ़ते लिखना गहरा आता है
हम तुम जैसे तो अमृत के प्यासे हैं
विष तो बस शिव को ही पीना आता है
पैर नहीं जलते उनके सूरज से भी
जिनको अंगारों पर चलना आता है
फिर उस घर हर दिन दीवाली होती है
लौटके जिस घर फ़ौजी बेटा आता है
उस पंछी का स्वागत करता है अंबर
पिंजरा तोड़के जिसको उड़ना आता है
ग़ज़लें सुनते-सुनते जब सो जाता हूँ
सपने में बस तेरा चेहरा आता है
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