"गाँव का जीवन"

गाँव का जीवन शहरों से कम नहीं
वो मिट्टी का घर महलों से कम नहीं

रोटी पर घी नमक लगाकर खाते हैं
शहर के चीज़ वाले पिज़्ज़ा नहीं भाते हैं
यहाँ पीते हैं कुएं का ऐसा पानी हम
शहर में जो पैसे देकर भी नहीं पी पाते हैं

पेड़ों की ठंडी हवा ऐसी से कम नहीं
नेट ना चलने का यहाँ कोई ग़म नहीं
क्रिकेट यहाँ लकड़ी के डंडे से खेलते हैं
बड़ों की डाँट भी यहाँ हंस कर झेलते हैं

शहर में आम भी बाज़ार से लाते हैं
शहर के बच्चे पेड़ पर कहाँ चढ़ पाते हैं
कभी घर का मथा हुआ मक्खन खाया है
जिस की बराबरी पैकेट का बटर कहाँ कर पाया है

आज भी मेहमानों को बुला कर घर लाते हैं
शहर में तो मेहमान आने से मुह बन जाते हैं
नीचे बैठ कर यहाँ सब खाना खाते हैं
रात को छत पर तारों के नीचे सो जाते हैं

गाँव के कच्चे झूले पर जो एक बार झूल जाओगे
सच कहता हूँ शहर का जीवन भूल जाओगे

— Sanskar Shrivastav

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