बज़ाहिर हमीं अश्क से सींचते हैंहुआ कब हरा इक शजर ज़िन्दगी भरमिरा इश्क़ मुझमें सलामत पड़ा हैमुझे भी न होगी ख़बर ज़िन्दगी भर— Lokesh Vashishtha