कि तुझ को ढूँढ़ के देखा सभी में
मगर तू मिल नहीं पाया किसी में
गुज़रती उम्र गर ये साथ तेरे
मज़ा कुछ और आता ज़िन्दगी में
तुझे भूलूँ भी तो फिर किस तरह से
मकाँ तेरा है मेरी ही गली में
मुसलसल बढ़ रहा है फ़ासला अब
कि मुझ में और अच्छे आदमी में
वो जिस को सेव करना था ना मुझ को
वो मुझ से कट गया है हड़बड़ी में
— Sarvjeet Singh















