पराई आग में रिश्ता कहाँ सँभलता है
कि आँधियों में दुपट्टा कहाँ सँभलता है
कमी रही भी तो बेचैनियाँ नहीं जाती
बरस पड़े भी तो पैसा कहाँ सँभलता है
कहानी कार तो किरदार मार सकता है
पर इतनी बात से क़िस्सा कहाँ सँभलता है
बड़े-बड़ों को भी इज़्ज़त हज़म नहीं होती
बड़े-बड़ों से भी लहजा कहाँ सँभलता है
कभी कभी तो पड़ोसी सँभाल लेते थे
पर अब तो माँ से भी बच्चा कहाँ सँभलता है
— Saurabh Sharma 'sadaf'















