सरहदे-मौत पर भी मिली ही नहीं
है कि हिस्से मेरे ज़िन्दगी ही नहीं
ख़ामुशी है उदासी व अफ़सुर्दगी
शामिले-जश्न है ख़ुद-कुशी ही नहीं
एक लड़की कि जिस का दिखा अक़्स था
चौक पर ही वो थी और थी ही नहीं
माँगती और बोसा है तिश्ना जबीं
अज़्ल की आग है ये बुझी ही नहीं
जाएँ रोने कहाँ ऐ ख़ुदा तू बता
है कि दुनिया में अब तीरगी ही नहीं
— SWAPNIL YADAV 'NIL'















