लोग जब मुस्कुरा के मिलते हैं
कफ़ में ख़ंजर छुपा के मिलते हैं
कैसी सूरत बना के मिलते हैं
कई चेहरे लगा के मिलते हैं
हिज्र में उन के कैसी गरमाइश
सर्द झोंके हवा के मिलते हैं
और माज़ी में कुछ नहीं मिलता
चंद वादे वफ़ा के मिलते हैं
जल चुकी बस्तियों की साज़िश में
कुछ इरादे हवा के मिलते हैं
बा'द मुद्दत बहार आती है
पहले मौसम ख़ला के मिलते हैं
— Shadan Ahsan Marehrvi















