अब तो घर मुझको घर नहीं लगता
दिल मेरा इक पहर नहीं लगता
ज़िन्दगी अब सज़ा सी लगती है
मौत से भी तो डर नहीं लगता
छोड़ कर जबसे तुम गए मुर्शिद
अच्छा अब रहगुज़र नहीं लगता
कैसे मुमकिन हो लौट आओ तुम
रेत में तो शजर नहीं लगता
वो जो इक पेड़ था हरा उस
में
कोई भी अब समर नहीं लगता
क़ैदख़ाना है घर तुम्हारे बिन
घर ज़रा सा भी घर नहीं लगता
मुन्तक़िल जब से हो गए हो तुम
दिल हमारा इधर नहीं लगता
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