तकाज़े जो निभाते रास्तों के
तो टल सकते थे मंज़र हादसों के
ठिकाने ढूँढ़ने में सूफियों के
मैं ज़द में आ गया हूँ कूफ़ियों के
मसीहा जब तलक भेजे न यज़दाँ
दीए बुझते नहीं हैं ज़ुल्मतों के
जो मसनद पे यहाँ बैठा है हाकिम
नहीं सुनता है नाले बेकसों के
बज़ाहिर कर के ईमाँ का दिखावा
लबादे ओढ़े हम ने मोमिनों के
तुझे चाहा परखना तब ये जाना
कि ज़द में आ गया हूँ वसवसों के
मेरा लाशा उठाए फिर रहे हैं
बदलते काँधे मेरे दोस्तों के
मुसलसल गूंगे रह कर एक अर्सा
सितम सहते रहे हम बामनों के
— Shadan Ahsan Marehrvi















