कैसे सुनाऊँ दुखड़ा मैं पीर मीर साहब

आँखों में जम गई है तस्वीर मीर साहब

आँसू नहीं गिरे हैं शो'ला नहीं उठा है
फिर भी पिघल रही है ज़ंजीर मीर साहब

दिल्ली धधक रही है सब शोर कर रहे हैं
दोहरा रहे हैं ग़ालिब तहरीर मीर साहब

लाशों पे चल रहे हैं और रक़्स कर रहे हैं
रस्ते बदल रहे हैं रहगीर मीर साहब

जैसी उदास आँखें वैसी उदास ग़ज़लें
इक शे'र है निशाना इक तीर मीर साहब

झेलम का सुर्ख़ पानी यमुना से आ मिला है
दिल्ली भी बन रही है कश्मीर मीर साहब

वहशत बला की वहशत, ख़लवत अजीब ख़लवत
रो रो के हो रहा हूँ, मैं 'मीर' मीर साहब

— Shahbaz Rizvi

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