मुझ को अपना बना गया कोई
ज़ख़्म फिर से दुखा गया कोई
इस को अपनी बता के जादूगरी
तेरी आँखें बना गया कोई
हुस्न वालों की एक महफ़िल में
मेरी आँखों को भा गया कोई
एक दुनिया थी ख़ुशबुओं जैसी
उस के धोखे में आ गया कोई
देर तक सोचता रहा तुम को
शे'र ऐसा सुना गया कोई
अपनी यादों के रतजगे देकर
मेरी मुस्कान खा गया कोई
इक तअल्लुक़ जो मेरी दुनिया था
उस को जड़ से मिटा गया कोई
चाल ऐसी चली गई शहज़ान
हारी बाज़ी जिता गया कोई
— Shahzan Khan Shahzan'















