कल शब किसी के साथ मेरा राब्ता हुआ
कितना हसीन एक नया हादसा हुआ
आँखों पे उस के शे'र कहे मैं ने और फिर
दो चार पहलुओं पे यूँ ही तब्सिरा हुआ
क़ैदी ने क़ैदखाने के आदाब रट लिए
तब जा के उस के हक़ में कोई फ़ैसला हुआ
जिस ख़त पे तू ने इश्क़ का इज़हार था किया
कमरे में आज तक है वही ख़त पड़ा हुआ
बहसें मोहब्बतों के उसूलों पे जब हुईं
तकता रहा मैं देर तक उस को खड़ा हुआ
मौजूद हूँ अभी तो कोई बात भी करो
फिर बा'द में न कहना कि 'शहज़ान' क्या हुआ
— Shahzan Khan Shahzan'















