अपना जो बना ले वो नज़र ढूॅंढ रहे हैं
हम अपनी दु'आओं में असर ढूॅंढ रहे हैं
ये कौन सी दुनिया है जहाँ लोग ये सारे
रहने को तिरी बस्ती में घर ढूॅंढ रहे हैं
हँसते हुए चेहरों से हमें होती है वहशत
हम लोग उदासी के शजर ढूॅंढ रहे हैं
ताकि हमें मिल जाए कोई अच्छी सी सूरत
बस इस लिए हम उस का नगर ढूॅंढ रहे हैं
वो शख़्स जो दुनिया में मियाँ सब से अलग हो
देखा तो नहीं है उसे पर ढूॅंढ रहे हैं
हँसते हुए चेहरों से हमें होती है वहशत
हम लोग उदासी के शजर ढूॅंढ रहे हैं
— Shahzan Khan Shahzan'















