ye rizwan-o-wajid ka kehna hai shaakir | ये रिज़वान-ओ-वाजिद का कहना है 'शाकिर'

  - Shakir Sheikh

ये रिज़वान-ओ-वाजिद का कहना है 'शाकिर'
बहुत ख़ूब तेरी कलम चल रही है

  - Shakir Sheikh

Aawargi Shayari

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    बे-ग़रज़ वो बच्चों से कर रही मोहब्बत है
    माँ के जैसी उल्फ़त की और कौन मूरत है

    माँ की आँखों से बहता क़तरा भी समंदर है
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    उम्र माँ के क़दमों में हो बसर मेरी सारी
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    Shakir Sheikh
    नब्ज़ देखो न अब तबीब मेरी
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    Shakir Sheikh
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    छोड़ दो उसको अपने ही अब हाल पर
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    दुनिया वालों से उम्मीद रक्खी नहीं
    रब से पाया है सब सर झुकाने के बाद

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    कैसे सोया है वो थपथपाने के बाद

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    ख़ूब देगा ख़ुदा आज़माने के बाद
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    Shakir Sheikh
    दुश्मनों से मुझे गिला ही नहीं
    प्यार तूने भी तो किया ही नहीं
    Shakir Sheikh
    उनकी आँखों में कहीं ख़ार नज़र आते हैं
    मेहरबाँ मुझ पे मेरे यार नज़र आते हैं

    दिल दुखाने सदा तैयार नज़र आते हैं
    मुझ से जलते हुए दो चार नज़र आते हैं

    मरने वाले की सभी करते हैं तारीफ़ यहाँ
    ज़िंदा हैं जो यहाँ बेकार नज़र आते हैं

    उनके हर ख़्वाब किए हमने है पूरे लेकिन
    हम तो उनको भी गुनहगार नज़र आते हैं

    एक दिन वक़्त का खाएँगे तमाचा वो भी
    आज जो चेहरे से अंगार नज़र आते हैं

    ज़र ज़रा सा जो हुआ पास में मेरे 'शाकिर'
    सब के सब मेरे तरफ़दार नज़र आते हैं
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    Shakir Sheikh

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