तीरगी में कुछ नहीं बस तीरगी है
घर के बाहर देख कितनी रौशनी है
एक जैसे सुख हैं सब के और दुख भी
जो तुम्हारी वो हमारी ज़िंदगी है
एक वो है एक वो है एक वो उफ़
और किस किस से तुम्हारी दोस्ती है
ये अगर मैं भी नहीं तो कौन है फिर
आइने में कौन मुझ पर हँस रही है
सीधी सादी बात है गर कोई समझे
दोस्त दुश्मन आदमी का आदमी है
पहले जैसा कुछ नहीं इस दौर में अब
हर किसी को हर कोई अब अजनबी है
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