दश्त-ए-तन्हाई मिली तेरी मुहब्बत में हमें
अब चलो कुछ तो मिला जाँ तेरी इबरत में हमें
तू मिली हम भी मिलें आँसू मिलें रुस्वाई भी
जाने क्या क्या था मिला वो तेरी हसरत में हमें
चाँद है तारें हैं तेरी कहकशाँ में दिलरुबा
हैं मिली रौशन फ़ज़ा भी तेरी सोहबत में हमें
हम वो दरिया हैं जिसे सागर नहीं मिलता कभी
यूँ ही बहना है मिला अब ये जो क़िस्मत में हमें
हम जो यूँ बदनाम हैं 'साहिर' न ऐसे थे कभी
बस ये तोहफ़ा है मिला तेरी वो क़ुर्बत में हमें
— Sahir banarasi















