जाँ तुम्हें जो भूल जाने में कहीं मैं मर गया तो
नाम ये दिल से हटाने में कहीं मैं मर गया तो
आज़माओं तुम मुहब्बत बस मगर ये ध्यान देना
ये मुहब्बत आज़माने में कहीं मैं मर गया तो
तल्ख़ियाँ मुझ को भी हैं कुछ तुझ को भी होंगी मगर सुन
तल्ख़ियाँ को अब हटाने में कहीं मैं मर गया तो
चाँद बन कर ही सही जाँ छत पे मेरी आती रहना
रात काली ये बिताने में कहीं मैं मर गया तो
अश्क मेरे बहते हैं क्यूँ याद कर के उन को 'साहिर'
रोज़ ये रोने रुलाने में कहीं मैं मर गया तो
— Sahir banarasi















