कभी कभी मता-ए-ज़िंदगी उड़ाई गई
कभी शराब बिठा के हमें पिलाई गई
सुना के क़िस्सा मुहब्बत का हम को यारों कोई
क़सम वफ़ा की हमें झूटी फिर दिलाई गई
मुफ़ाइलुन फ़इलातुन का खेल भी है अजब
ग़म-ए-फ़िराक़ से फिर शा'इरी कराई गई
मिलें जो उन से तो 'साहिर' ये पूछना कभी तुम
वो बात जिस
में था वो क्यूँ वहाँ दबाई गई
— Sahir banarasi















