वैसे तो हमें अपनी ज़िन्दगी से कुछ ख़ास गिला नहीं
ये अलग बात है हमने जो चाहा वो कुछ भी मिला नहीं
पौधे बहुत लगाए थे बाग ए गुलज़ार में हमने मगर
हमारी ख़ुशियों का फूल एक भी खिला नहीं
ज़ख्म इतने मिलते रहे कि सब नासूर हो गए हैं
वक़्त के धागों ने भी उन ज़ख्मों को सिला नहीं
चंद लम्हों के लिए लबों पर हसीं लाया था इक शख़्स
कि वो शख़्स हमारी यादों से अब तक हिला नहीं
खैर सारा आ
समाँ नाप लेंगे एक दिन हम "निहार"
ये हौसलों की उड़ान है, कोई रेत का किला नहीं
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