इस क़दर बे-ख़बर चला जाए
पाँव रह जाएँ सर चला जाए
वो जो बैठा है मेरी राहों में
उस से कह दो कि घर चला जाए
कोई ता'वीज़ ऐसा दे मुर्शिद
जिस से अंदर का डर चला जाए
या तो मेरा रहे वो सौ फ़ीसद
या मुझे छोड़ कर चला जाए
उम्र ऐसे गुज़ार दी जैसे
नींद में रात भर चला जाए
ख़ाली काग़ज़ ही भेज दो 'फ़हमी'
ये न हो नामा-बर चला जाए
— Shaukat Fehmi















