ऐ ज़िन्दगी हर दर्द तेरा इस क़दर सहते रहे

सब को नहीं थी कुछ ख़बर चुप-चाप हम ऐसे रहे

कोशिश हवा ने की बहुत हम रात भर लड़ते रहे
बुझती हुई लौ की तरह हारे नहीं जलते रहे

मजबूर इतना कर दिया हालात ने हम को कि हम
बस बारहा गिरते रहे और बारहा हँसते रहे

मुमकिन नहीं था ये सफ़र, घुटने छिले तलवे फटे
मंज़िल तुझे था
में हुए तेरी तरफ़ बढ़ते रहे

कुछ लोग कहते हैं मोहब्बत इक दफ़ा होती है बस
तुम दूसरे के हो गए, हम उम्र भर रोते रहे

कैसे 'तबस्सुम' ज़िन्दगी इक साल पीछे हो ज़रा
ये काश होंठों पर मेरे यूँ ही सदा खलते रहे

— Anukriti 'Tabassum'

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