कर के वो आँखें मेरी पुर-नम गया था

छोड़ कर मुझ को मेरा हरदम गया था

जब फँसी थी ओढ़नी उस की घड़ी में
मुस्कुरा कर वक़्त जैसे थम गया था

आ गई है अब ख़ुशी मेरे भी दर पर
ग़म से जाने को कहा तो ग़म गया था

चाँद चुप था इक सितारा टूटने पर
जैसे उस का ही कोई हमदम गया था

दिल पे क़दमों के निशाँ बनते थे लेकिन
दूर तक हर इक निशाँ कुछ कम गया था

ये 'तबस्सुम' आदतन सच बोलती थी
जो उठा महफ़िल से वो बरहम गया था

— Anukriti 'Tabassum'

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