जो ख़ुशी ही छीन ले वो नौकरी किस काम की

चंद पैसों की भला ये तिश्नगी किस काम की

दिल लगाया भी नहीं औ' दिल दुखाया भी नहीं
ये नदामत है तुम्हें तो ज़िन्दगी किस काम की

जब रिफ़ाक़त तीरगी से हो गई अच्छी भली
ये दिया ये चाँदनी उफ़ रौशनी किस काम की

सिलसिला कैसा तग़ाफ़ुल का हमारे दरमियाँ
है मुहब्बत दिल में तो ये बे-रुख़ी किस काम की

शहर के तन्हा सफ़र से भर गया है मन ये पर
गाँव में अब तू नहीं है वापसी किस काम की

हसरतें जज़्बात बातें कुछ न करते हैं बयाँ
तो बताओ शे'र और ये शा'इरी किस काम की

ऐ 'तबस्सुम' साँस लेना ज़िन्दगी बस है नहीं
ज़िन्दगी है गर यही तो ख़ुद-कुशी किस काम की

— Anukriti 'Tabassum'

More by Anukriti 'Tabassum'

Other ghazal from the same pen

See all from Anukriti 'Tabassum' →

Dil Shayari

Shers of dil.

All Dil Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling