अब नहीं है इश्क़ में वो रौशनी
मिट सकेगी जिस से दिल की तीरगी
इश्क़ का है रूप कोई और ही
माँग जिस
में दिख रही है जिस्म की
हर तरफ़ ही हैं मरीज-ए-इश्क़ अब
आ गई हो जैसे कोई त्रासदी
चूमने से मिट गए हैं रोग सब
जा चुकी है डॉक्टर की नौकरी
कार के ट्रैफ़िक में जैसे साइकिल
यूँ फँसी है ग़म में मेरी ज़िंदगी
दिल का दरिया है नहीं इतना भरा
कर सकूँ जो डूब कर मैं ख़ुद-कुशी
ढूँढ़ने में वक़्त जाया मत करो
वक़्त आने पर मिलेगी हर ख़ुशी
— Shivam Rathore















