इक ज़िंदा तस्वीर बना दी पत्थर से
क्या उम्मीद लगाऊँ अब कारीगर से
बाहरस सब अच्छे दिखते हैं लेकिन
सारे ही मटके फूटे हैं अंदर से
शायद अगली बार मिले मंज़िल मुझ को
अब के फेल हुआ हूँ इक दो नंबर से
ख़ुदस ख़ुद का हाल किसी दिन पूछेंगे
फ़ुर्सत मिल जाएगी जब भी दफ़्तर से
इक तैराक हुनर पर ज़्यादा इतराया
उस की लाश मिली इक रोज़ समुंदर से
तुम को देखा तो मुझ को विश्वास हुआ
धरती पर उतरी हैं परियाँ अंबर से
— Shivam Rathore















