प्रेम के जंजाल में औरत फँसी है
प्रेमियों की जाल में औरत फँसी है
घर संँभाले जा रही है भूल ख़ुद को
फ़र्जियों की चाल में औरत फँसी है
जन्मदिन हो या हो शादी का महीना
सिर्फ़ रोटी दाल में औरत फँसी है
हर युगों में देख लो पन्ने उठा कर
बेबसी की हाल में औरत फँसी है
भागते हैं दो मगर बदनाम वो है
आदमी की जाल में औरत फँसी है
— Shubhangi Bharti














