जो होता है नज़र में आना तेरा

तो बनता है कोई अफ़साना तेरा

मेरी हर ग़लती पे पछताना तेरा
दोबारा ख़ुद को यूँॅं समझाना तेरा

मेरी आँखों से पढ़ के देख मुझ को
अभी यकसाँ नहीं पैमाना तेरा

तरी आँखों से देखा है शजर ने
परिंदे की तरह उड़ जाना तेरा

दिलों की उलझनें कम होती जाऍं
मेरे सर को मिले गर शाना तेरा

तबस्सुम खिल गए पतझड़ में जब भी
हुआ है मुस्कुरा के आना तेरा

वो रस्ते जो सदाऍं देते हैं ना
वहाँ पर रहता है परवाना तेरा

— Shubh Mathur

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