उस को कहना कि मुहब्बत न करे

गर करे तो वो शिकायत न करे

वस्ल उस शख़्स से हो मेरा जो
मरने के बा'द भी हिजरत न करे

उस के ही शहर के शाइ'र थे सब
उस की फिर कैसे रिवायत न करे

ऐब जब उस के गिनाने मैं लगूँ
फिर कोई उस की हिमायत न करे

टूटे हैं सारे तअल्लुक़ तो अब
यार वो हम से अदावत न करे

— Simar Gozra

More by Simar Gozra

Other ghazal from the same pen

See all from Simar Gozra →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling