koi khoobsurat mujhe ab nazaara nahin dekhna hai | कोई ख़ूबसूरत मुझे अब नज़ारा नहीं देखना है

  - Sohil Barelvi

कोई ख़ूबसूरत मुझे अब नज़ारा नहीं देखना है
क़सम है ख़ुदा की तुम्हें अब दोबारा नहीं देखना है

सहूलत अगर दे मुझे ज़िंदगी तो नया कुछ करूँँगा
गुज़िश्ता दिनों में जो मैं ने गुज़ारा नहीं देखना है

मैं किस को बताऊँ मेरे साथ क़िस्मत ने क्या खेल खेले
मुझे अब फ़लक पर कोई भी सितारा नहीं देखना है

अभी लुत्फ़ लेना है मुझ को कई साल तेरे करम का
अभी ज़ख़्म-ए-दिल का मुझे कोई चारा नहीं देखना है

मोहब्बत जिधर भी मुझे मिल रही है चला जा रहा हूँ
मेरे यार मुझ को हमारा तुम्हारा नहीं देखना है

अभी तो बहुत काम सोहिल तेरे बिन अधूरे पड़े हैं
अभी यार इस ज़िंदगी का किनारा नहीं देखना है

  - Sohil Barelvi

Nigaah Shayari

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