ये धूप गिरी है जो मिरे लॉन में आ कर
ले जाएगी जल्दी ही इसे शाम उठा कर
सीने में छुपा शाम की आँखों से बचा कर
इक लहर को हम लाए समुंदर से उठा कर
हाँ वक़्त से पहले ही उड़ा देगी इसे सुब्ह
रक्खी न गई चाँद से गर शब ये दबा कर
इक सुब्ह भली सी मिरे नज़दीक से गुज़री
मैं बैठा रहा हिज्र की इक रात बिछा कर
फिर सुब्ह से ही आज अलम देख रहे हैं
यादों की कोई फ़िल्म मिरे दिल में चला कर
फिर चाय में बिस्कुट की तरह भूकी सी ये शाम
खा जाएगी सूरज को समुंदर में डुबा कर
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