soone soone se falak par ik ghatta banti hui | सूने सूने से फ़लक पर इक घटा बनती हुई

  - Swapnil Tiwari

सूने सूने से फ़लक पर इक घटा बनती हुई
धीरे धीरे उस की आमद की फ़ज़ा बनती हुई

जन्म का बस एक लम्हा और अब ये ज़िंदगी
इक ज़रा सी बात बढ़ कर मसअला बनती हुई

क़ैद सी लगने लगी है मुझ को ये आवारगी
अब तो आज़ादी भी मेरी इक सज़ा बनती हुई

तेरी दी हर चोट इक लज़्ज़त सी है मेरे लिए
अब ये लज़्ज़त दाइमी सा ज़ाइक़ा बनती हुई

कर गई है किस क़दर मसरूफ़ मुझ को देखिए
मेरी सुब्ह-ओ-शाम का वो मश्ग़ला बनती हुई

हैं सभी टूटे हुए ये जान पाया जब दुखी
मेरी इक टूटी सदा सब की सदा बनती हुई

ऐ मिरे साए मिला है जब से तुझ सा हम-सफ़र
रास्ते की हर मुसीबत रास्ता बनती हुई

थम चुकी थी जब कि हर हलचल तिरी याद आई फिर
ज़िंदगी की सतह पर इक बुलबुला बनती हुई

मेरी आँखें हैं अभी भी इस तिलिस्मी क़ैद में
इस की वो धुँदली सी सूरत जा-ब-जा बनती हुई

इस जलन के साथ ही रहना है अब 'आतिश' मुझे
जो मिरी ज़िद थी कभी अब वो अना बनती हुई

  - Swapnil Tiwari

Khuddari Shayari

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